नीरा आर्या: INA की पहली महिला जासूस जिसने पति को कुर्बान किया, देश को जीत दिलाई
🌿 परिचय और प्रारंभिक जीवन:
भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में कई नायकों और नायिकाओं के नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे गए हैं। उन्हीं में एक अनसुना नाम है – नीरा आर्या। आज भी बहुत से लोग उनके बलिदान और बहादुरी की कहानी से अंजान हैं। 5 मार्च 1902 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा कस्बे में जन्मी नीरा आर्या एक क्रांतिकारी महिला थीं, जिन्होंने अपने पति की हत्या कर देशभक्ति की पराकाष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
उनके पिता श्री बंसीधर व्यवसाय से व्यापारी थे और कोलकाता में रहते थे। नीरा ने शिक्षा कोलकाता से प्राप्त की और हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली जैसी कई भाषाओं में दक्षता हासिल की। बचपन से ही उनमें आज़ादी के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था।
⚔️ आज़ाद हिंद फौज में सम्मिलन:
देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह चरम पर था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज का गठन किया और उसमें महिलाओं की एक अलग टुकड़ी बनाई – रानी झांसी रेजिमेंट। नीरा आर्या ने इस रेजिमेंट में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनना तय किया।
रानी लक्ष्मीबाई की प्रेरणा से बनी इस रेजिमेंट में नीरा ने न केवल सैन्य प्रशिक्षण लिया बल्कि उन्हें नेताजी की सुरक्षा और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए जासूस की भूमिका में भी नियुक्त किया गया। उनका कार्य था ब्रिटिश सेना में घुसपैठ करके सूचनाएं एकत्र करना।
⚡️ पति की हत्या: देशभक्ति की चरम सीमा:
नीरा आर्या की शादी श्रीकांत जयरंजन दास से हुई थी, जो ब्रिटिश सरकार के लिए सीआईडी अफसर थे। समय के साथ नीरा को पता चला कि उनके पति नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या की योजना में शामिल हैं। यह जानकर नीरा के सामने एक असाधारण निर्णय का क्षण आया – देशभक्ति या पत्नी धर्म।
देशभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए नीरा ने अपने ही पति की हत्या कर दी ताकि नेताजी की जान बचाई जा सके। यह घटना उस समय के लिए स्तब्धकारी थी, और नीरा को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
🔹 गिरफ्तारी और जेल की यातनाएं:
नीरा आर्या को अंडमान-निकोबार के कुख्यात सेलुलर जेल में भेजा गया, जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता था। वहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। इतिहास में दर्ज है कि उनके स्तनों को लोहे की छड़ों से जलाया गया ताकि वे नेताजी और INA की जानकारी उगल दें।
लेकिन नीरा चट्टान की तरह डटी रहीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और हर यातना को सहते हुए राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। यह उनका साहस ही था जिसने उन्हें इतिहास में एक अमिट स्थान दिलाया।
🌎 आज़ादी के बाद जीवन:
भारत को स्वतंत्रता तो मिली लेकिन नीरा को न वह सम्मान मिला और न वह जीवन जो उन्हें मिलना चाहिए था। जेल से छूटने के बाद वे हैदराबाद में फूल बेचकर गुज़ारा करने लगीं। समाज ने उन्हें अपनाने की जगह उपेक्षित कर दिया।
26 जुलाई 1998 को उन्होंने हैदराबाद में अंतिम सांस ली। अंतिम समय में भी उनके पास न कोई परिवार था, न सरकार की मदद। एक ऐसी नायिका जिसे देश को याद रखना चाहिए, गुमनामी में विदा हो गई।
🌟 विरासत और आधुनिक स्मरण
हाल के वर्षों में नीरा आर्या को लेकर नई पीढ़ी में रुचि बढ़ी है। कई मंचों पर उनके बलिदान की चर्चा होने लगी है। उनकी जीवन गाथा पर आधारित एक बायोपिक भी घोषित हुई है।
इसके अलावा उनके नाम पर शोध, निबंध, और महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं। नारीवाद के दृष्टिकोण से नीरा आर्या का जीवन संघर्ष, बलिदान और साहस का प्रतीक बन गया है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- नीरा आर्या कौन थीं?
- वे आज़ाद हिंद फौज की पहली महिला जासूस थीं।
- क्या उन्होंने सच में अपने पति की हत्या की थी?
- हाँ, नेताजी की जान बचाने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया।
- उनके जेल अनुभव कैसे थे?
- उन्हें काला पानी की सज़ा मिली और अत्यंत क्रूर यातनाएं दी गईं।
- स्वतंत्रता के बाद उनका जीवन कैसा रहा?
- वे गरीबी में रहीं और फूल बेचकर जीवन यापन किया।
- क्या उनके ऊपर कोई फिल्म बन रही है?
- हाँ, एक बायोपिक की घोषणा हो चुकी है।
📊 निष्कर्ष
नीरा आर्या का जीवन बलिदान, साहस और नारी शक्ति की पराकाष्ठा का परिचायक है। उन्होंने अपने निजी जीवन की खुशियों को देश पर न्योछावर कर दिया। आज आवश्यकता है कि ऐसे गुमनाम नायकों को सम्मान मिले और नई पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले।
उनकी कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि राष्ट्र सर्वोपरि होता है।
