१० जांबाज भारतीय सैनिकों की बहादुरी ने इतिहास रच दिया
भारत की सैन्य परंपरा साहस, त्याग और निष्ठा का प्रतीक रही है। ऐसे अनेक सैनिक हुए हैं जिन्होंने न सिर्फ अपने प्राणों की आहुति दी, बल्कि अपने अदम्य साहस और शौर्य से इतिहास रच दिया। यह लेख 10 ऐसे जांबाज भारतीय सैनिकों की कहानियों को समर्पित है, जिनकी वीरता आज भी हमें प्रेरित करती है।
भारत की धरती ने ऐसे अमर वीरों को जन्म दिया है, जिन्होंने देश की रक्षा में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। कारगिल की बर्फ़ीली चोटियों से लेकर रेगिस्तान के जलते मैदानों तक, इन जवानों ने अदम्य साहस दिखाया। किसी ने अकेले दुश्मनों के छक्के छुड़ाए, तो किसी ने टैंकों के सामने घुटने नहीं टेके। ये वीर सैनिक हमारे लिए प्रेरणा हैं, जो याद दिलाते हैं कि असली शौर्य बिना शोर के देश सेवा में होता है।
१. ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान – ‘नौशेरा का शेर’

भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित यह नाम है – ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, जिन्हें उनकी अदम्य वीरता के लिए ‘नौशेरा का शेर’ कहा जाता है। 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में जब पाकिस्तानी सेना ने नौशेरा पर कब्जा करने की धृष्टता की, तो ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी 50वीं पैरा ब्रिगेड के साथ ऐसा पराक्रम दिखाया कि दुश्मनों के छक्के छूट गए।
जब पाकिस्तानी सेना ने नौशेरा पर कब्जा करने के लिए भारी हमला किया, तो उस्मान ने अपनी कुशल रणनीति और अदम्य साहस से दुश्मनों को पीछे धकेल दिया। उन्होंने अपने सैनिकों के साथ मिलकर ऐसा जोश भरा कि दुश्मन की सेना के पाँव उखड़ गए। उन्होंने न केवल नौशेरा को सुरक्षित रखा, बल्कि 7,000 पाकिस्तानी सैनिकों को मुँह की खानी पड़ी। उनकी रणनीति और सैन्य कौशल ने युद्ध का पूरा पासा ही पलट दिया। 3 जुलाई, 1948 को अंतिम सांस तक लड़ते हुए उन्होंने अपना प्रसिद्ध वाक्य दोहराया – “मैं नौशेरा नहीं छोड़ूँगा, चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए!”
ब्रिगेडियर उस्मान को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी भारतीय सेना में उनकी वीरगाथा गाई जाती है और वे हर भारतीय के लिए असीम प्रेरणा हैं।
ब्रिगेडियर उस्मान का बलिदान न केवल भारतीय सैन्य इतिहास की एक गौरवगाथा है, बल्कि यह हर भारतीय के लिए अटूट देशभक्ति की प्रेरणा है। उनकी वीरता को नमन करते हुए हम कह सकते हैं – “सच्चे शेर तो वीरगति को प्राप्त होकर भी अमर हो जाते हैं!”
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार से; पिता पुलिस अधिकारी थे।
- शिक्षा: रॉयल मिलिट्री अकादमी, सैंडहर्स्ट (UK)
- सेना में प्रवेश: 1934 में भारतीय सेना में कमीशन मिला। 10वीं बलूच रेजिमेंट में सेवा शुरू की।
- ब्रेवरी स्टोरी: 1947-48 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की रक्षा करते हुए, उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद पाकिस्तान समर्थित कबायलियों को खदेड़ दिया। उन्होंने झांगर पोस्ट को तीन महीनों के अंदर पुनः हासिल किया, जहाँ वह शहीद हो गए। उनके अंतिम शब्द थे—“मैं मर रहा हूँ, लेकिन क्षेत्र न गिरे।”
- सम्मान: मरणोपरांत महावीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाक सेना का चीफ बनने का निमंत्रण दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।
– अविवाहित रहे, और सैलरी का बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई में दान करते थे।
– 1947-48 युद्ध में सर्वोच्च रैंकिंग वाले शहीद अधिकारी
– उनकी शहादत पर नेहरू और सरदार पटेल दोनों ने श्रद्धांजलि दी
– आज भी नौशेरा में उनकी समाधि सैनिकों के लिए तीर्थ स्थान है
२. कैप्टन मनोज कुमार पांडे – कारगिल के शूरवीर

कारगिल युद्ध के सबसे प्रतापी योद्धाओं में से एक, कैप्टन मनोज कुमार पांडे ने अपनी असाधारण वीरता से भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ा। 3 जुलाई 1999 की भोर, 16,500 फीट की ऊंचाई पर, 1/11 गोरखा राइफल्स के इस युवा अधिकारी ने जुबर टॉप पर दुश्मन के कब्जे वाले महत्वपूर्ण चौकी पर हमला किया, और असंभव सी लगने वाली विजय हासिल की। अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए, कैप्टन पांडे ने अकेले ही दुश्मन के तीन बंकरों को नष्ट किया, जबकि उनके शरीर में कई गोलियाँ लग चुकी थीं।
3 जुलाई 1999 की रात, बर्फीली चट्टानों पर खून से लथपथ लड़ाई में, कैप्टन पांडे ने अकेले ही तीन दुश्मन बंकरों को नष्ट किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, “ना हटेंगे, ना रुकेंगे, बस आगे बढ़ेंगे!” युद्धघोष कहते हुए उन्होंने अपनी टुकड़ी को आगे बढ़ने का आदेश दिया। अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए, उन्होंने अपनी टुकड़ी को विजय दिलाई।
उनकी इस अदम्य वीरता और साहस के लिए उन्हें भारतीय सेना के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। आज भी कारगिल की वीर भूमि उनकी गाथा गाती है – “एक सच्चा गोरखा योद्धा जिसने मृत्यु को भी परास्त कर दिया!”
- जन्म: 25 जून 1975, रुधा गांव, सीतापुर, उत्तर प्रदेश
- परिवार: पिता गोपीचंद पांडे (निवेश अधिकारी), माता मोहिनी पांडे, तीन भाई-बहन
- शिक्षा: सैनिक स्कूल लखनऊ → NDA → IMA देहरादून
- सेना में सेवा: 1/11 गोरखा राइफल्स, 1997 में कमीशन
- ब्रेवरी स्टोरी: 2-3 जुलाई 1999 की रात को कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन मनोज पांडे ने खालुबा रिज पर दुश्मन के चार बंकरों पर कब्जा करने के लिए नेतृत्व किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मनों का सफाया किया और अंत में वीरगति प्राप्त की। उनके अंतिम शब्द थे—“जय महाकाली, आओ गोरखाली।”
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– NDA इंटरव्यू में कहा था—“I want to win the Param Vir Chakra.” उन्होंने यह साबित भी किया।
– अपनी टुकड़ी को “हर हाल में जीतो” का आदेश देकर अमर हुए
– उनकी वीरता पर ‘एलओसी कारगिल’ फिल्म में विशेष दृश्य
– गोरखा रेजीमेंट में आज भी उनका नाम सर्वोच्च बहादुरी का प्रतीक
३. वीर अब्दुल हमीद – 1965 का अमर नायक

1965 के भारत-पाक युद्ध में अपनी असाधारण वीरता से इतिहास रचने वाले कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने अकेले ही पाकिस्तान के 7 आधुनिक पैटन टैंकों को ध्वस्त कर दिया था। खेमकरण सेक्टर में असल उत्तर की लड़ाई के दौरान, इस वीर ने अपनी ‘गन माउंटेड जीप’ से दुश्मन के सात टैंकों को नष्ट किया, जिसमें चार अकेले 10 सितंबर 1965 की रात को तबाह किए।
अपनी अंतिम लड़ाई में, जब उनकी जीप टैंक के गोले से ध्वस्त हो गई, तब भी वे अपनी राइफल से लड़ते रहे। उनके शरीर में 15 से अधिक गोलियाँ लगने से उनका शरीर गोलियों से छलनी हो गया था, मगर उन्होंने अंतिम सांस तक मोर्चा नहीं छोड़ा और अपनी गन से दुश्मन पर गोलाबारी करते रहे। उनकी वीरता ने पूरे सेक्टर में भारत की जीत सुनिश्चित की। उनकी इस अद्भुत वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
आज भी सेना के जवान उनके इस वाक्य को याद करते हैं – “जब तक सांस है, तब तक देश की रक्षा करो!” उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि सच्चा वीर कभी हार नहीं मानता।
- जन्म: 1 जुलाई 1933, धरमपुर, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश
- परिवार: एक साधारण बुनकर परिवार से संबंध, प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही
- सेना में प्रवेश: 1954 में ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती
- ब्रेवरी स्टोरी: 1965 के भारत-पाक युद्ध में खेमकरण सेक्टर में, अब्दुल हमीद ने अकेले आरसीएल गन से सात से अधिक पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। उनकी असाधारण रणनीति और साहस ने पूरी बटालियन को प्रेरित किया।
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– उनकी वीरता पर “Border” फिल्म में विशेष दृश्य
– पाकिस्तानी सेना ने उन्हें “असल उत्तर का भुत” नाम दिया
– उनके नाम पर गाजीपुर में स्मारक और कई विद्यालय स्थापित हैं।
– उनके गाँव में प्रतिवर्ष 10 सितंबर को शहीदी दिवस मनाया जाता है
४. कैप्टन विक्रम बत्रा – “ये दिल मांगे मोर”

कारगिल युद्ध के सबसे प्रतापी नायकों में से एक, कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपनी अदम्य वीरता और जोश से भारतीय सेना के इतिहास में अमर हो गए। 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स की टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने प्वाइंट 5140 और प्वाइंट 4875 जैसे रणनीतिक ऊंचाईयों को दुश्मनों से मुक्त कराया।
20 जून 1999 को 17,000 फीट की ऊंचाई पर, इस युवा अधिकारी ने प्वाइंट 5140 पर ऐतिहासिक विजय हासिल की। अपने सैनिकों के साथ “ये दिल मांगे मोर!” का नारा लगाते हुए उन्होंने दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त किया।
7 जुलाई 1999 की रात, प्वाइंट 4875 पर अंतिम लड़ाई में, विक्रम ने अपने घायल साथी को बचाने के लिए खुद को दुश्मन की गोलियों के सामने झोंक दिया। उनका अंतिम संदेश था – “जीत की खुशबू मुझसे ज्यादा मेरे देश को जरूरत है!”
उनकी असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। कारगिल की बर्फीली चोटियाँ आज भी उनकी गाथा गाती हैं – “एक ऐसा शेरदिल जिसने मौत को भी मात दे दी!”
- जन्म: 9 सितंबर 1974, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
- परिवार: पिता—गिरीधर लाल बत्रा (प्रिंसिपल), माता—कमल कंवर बत्रा, जुड़वां भाई—विशाल
- शिक्षा: DAV स्कूल पालमपुर → पंजाब यूनिवर्सिटी → IMA देहरादून
- सेवा: 13 JAK Rifles, 1997 में कमीशन
- ब्रेवरी स्टोरी: कारगिल युद्ध में प्वाइंट 5140 और 4875 को दुश्मनों से मुक्त कराया। गोली लगने के बाद भी अपने साथी को बचाते हुए शहीद हो गए। उनका संदेश—“ये दिल मांगे मोर”—राष्ट्रव्यापी भावना बन गया।
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– उनके जुड़वां भाई ने भारतीय सेना जॉइन की
– उनके नाम पर DRDO ने विक्रम बत्रा सैटेलाइट लॉन्च किया
– उनके जीवन कहानी पर आधारित ‘शेरशाह’ नाम से फिल्म प्रसिद्ध हुई।
५. नायब सूबेदार संजय कुमार – कारगिल युद्ध के नायक

कारगिल युद्ध के इस वीर योद्धा ने 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के साथ मिलकर प्वाइंट 4875 पर असंभव सी लगने वाली विजय हासिल की। 4 जुलाई 1999 को, बर्फ से ढकी 16,000 फीट की ऊंचाई पर, संजय कुमार ने अकेले ही दुश्मन के तीन बंकरों को नष्ट किया, जबकि उनके शरीर में कई गोलियाँ लग चुकी थीं।
उनकी असाधारण वीरता का वर्णन करते हुए उनके साथी सैनिक कहते हैं – “वह बर्फ पर खून की लकीरें छोड़ते हुए भी आगे बढ़ता रहा!” उनके इस अद्भुत साहस के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने जीवित रहते हुए प्राप्त किया।
संजय कुमार की यह कहानी हर भारतीय को सिखाती है कि “सच्चा साहस कभी हार नहीं मानता”। आज भी कारगिल की वादियाँ उनकी बहादुरी की गवाही देती हैं।
- जन्म: 3 मार्च 1976, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश
- परिवार: पिता—दुर्गा राम; तीन भाई-बहन
- सेना में सेवा: 13 JAK Rifles
- ब्रेवरी स्टोरी: 4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप पर उन्होंने बंकर में अकेले घुसकर कई दुश्मनों को मार गिराया। खुद घायल होकर भी मोर्चा नहीं छोड़ा। उनके नेतृत्व से पोस्ट पर कब्जा हुआ।
- सम्मान: परमवीर चक्र (जीवित)
- विशेष तथ्य:
– कारगिल युद्ध में जीवित रहते हुए परमवीर चक्र पाने वाले गिने-चुने योद्धाओं में से एक
– वर्तमान में सूबेदार मेजर के पद पर, युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं।
– आज भी सेना में सेवारत, युवा सैनिकों के लिए प्रेरणास्रोत
६. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव – टाइगर हिल का हीरो

4 जुलाई 1999 की भीषण रात, 18,000 फीट की ऊंचाई पर, एक 19 वर्षीय युवा सैनिक ने अकेले ही कारगिल युद्ध का नक्शा बदल दिया। 18 ग्रेनेडियर्स के इस जांबाज सिपाही ने टाइगर हिल पर चढ़ाई करते समय 15 गोलियाँ खाकर भी दुश्मन के तीन बंकरों को ध्वस्त किया।
योगेंद्र सिंह यादव का शरीर जब गोलियों से छलनी हो चुका था, तब भी उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक लड़ाई जारी रखी। उनकी इस अद्भुत वीरता ने भारतीय सेना को टाइगर हिल पर विजय दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।
इस अभूतपूर्व साहस के लिए उन्हें सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी उनकी वीरगाथा सेना के प्रशिक्षण केंद्रों में सुनाई जाती है – “एक ऐसा योद्धा जिसने मौत को भी मात दे दी!”
- जन्म: 10 मई 1980, औरंगाबाद, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
- सेवा: 18 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट
- ब्रेवरी स्टोरी: टाइगर हिल पर चढ़ाई के दौरान दुश्मनों की गोलीबारी में घायल हुए, फिर भी चोटी तक पहुंचकर ग्रेनेड से बंकर को तबाह किया और पोस्ट पर कब्जा करवाया।
- सम्मान: परमवीर चक्र (जीवित)
- विशेष तथ्य:
– वीरता के समय उनकी आयु केवल 19 वर्ष थी।
– कारगिल युद्ध में सर्वोच्च शौर्य पुरस्कार पाने वाले सबसे युवा सैनिक
– आज भी सेना में सक्रिय, युवा जवानों के लिए प्रेरणा
– उनकी वीरता पर बनी फिल्म ‘एलओसी कारगिल’ में उनका चरित्र अमर हो गया
७. लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल – 1971 का टैंक योद्धा

16 दिसंबर 1971 की ऐतिहासिक रात, शकरगढ़ सेक्टर में भारत-पाक युद्ध के दौरान, मात्र 21 वर्षीय इस वीर अधिकारी ने अपने ‘पूना हॉर्स’ रेजिमेंट के टैंक से अकेले ही दुश्मन के आठ पैटन टैंकों को ध्वस्त कर दिया। जब उनका टैंक क्षतिग्रस्त हो गया, तब भी उन्होंने दुश्मन के टैंकों पर हमला जारी रखा – “एक सच्चे योद्धा की तरह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए”।
उनकी इस अद्भुत वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी पाकिस्तानी सेना उनके नाम से थर्राती है – “वह भारतीय टैंक कमांडर जिसने अकेले ही युद्ध का रुख बदल दिया!”
उनका अंतिम संदेश आज भी हर सैनिक के हृदय में गूँजता है:
“नो रिट्रीट, नो सरेंडर – ऑनली विक्ट्री!”
- जन्म: 14 अक्टूबर 1950, पुणे, महाराष्ट्र
- सेवा: 17 पूना हॉर्स रेजिमेंट
- ब्रेवरी स्टोरी: बसंतर नदी के पास पाकिस्तान के टैंक हमले को रोकने के लिए उन्होंने अपने टैंक स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। तीन टैंक ध्वस्त किए, चौथे में रहते हुए शहीद हो गए।
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– केवल 21 वर्ष की उम्र में अद्वितीय वीरता दिखाई।
– सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले अधिकारियों में से एक
– उनकी वीरता पर पाकिस्तानी जनरल ने कहा था – “अगर ऐसे 5 अधिकारी भारत के पास हों, तो हम कभी नहीं जीत सकते”
– उनके नाम पर भारतीय सेना की प्रतिष्ठित खेत्रपाल ट्रॉफी दी जाती है
८. मेजर शैतान सिंह – 1962 की चीन जंग के योद्धा

18 नवंबर 1962 को 17,000 फीट की ऊंचाई पर, -30°C तापमान में, मेजर शैतान सिंह ने अपनी 13 कुमाऊं रेजीमेंट की 120 सैनिकों की टुकड़ी के साथ चीनी सेना के 5,000 सैनिकों का सामना किया। रेजांग ला की इस ऐतिहासिक लड़ाई में उन्होंने अंतिम सांस तक अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी – “हर सैनिक के साथ खड़े रहे, हर गोली का जवाब दिया!”
जब उनका शरीर गोलियों से छलनी हो गया, तब भी वे अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे। इस लड़ाई में 114 में से 109 भारतीय सैनिक शहीद हुए, लेकिन 1,300 चीनी सैनिकों को मार गिराया।
उनकी इस अद्भुत वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी लद्दाख की वादियाँ उनकी गाथा गाती हैं – “वह शेर जिसने हिमालय की चोटी पर भारत का गौरव अमर कर दिया!”
- जन्म: 1 दिसंबर 1924, जोधपुर, राजस्थान
- सेवा: कुमाऊं रेजिमेंट
- ब्रेवरी स्टोरी: रेजांग ला पोस्ट पर 114 जवानों के साथ 1000 से अधिक चीनी सैनिकों को 18,000 फीट की ऊंचाई पर रोका। अंतिम समय तक मोर्चे पर डटे रहे और वीरगति प्राप्त की।
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– रेजांग ला की लड़ाई को भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे साहसी लड़ाइयों में गिना जाता है।
– रेजांग ला मेमोरियल पर लिखा है: “How can a man die better than facing fearful odds?”
– इस लड़ाई को “भारतीय सैन्य इतिहास का सबसे वीरतापूर्ण सामूहिक बलिदान” माना जाता है
– चीनी सेना ने भी इस युद्ध को अपने सैन्य पाठ्यक्रम में शामिल किया है
९. सूबेदार जोगिंदर सिंह – नेफा युद्ध में रणवीर

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, तवांग सेक्टर में एक ऐसे वीर ने इतिहास रचा जिसकी गाथा आज भी सेना के जवानों में जोश भर देती है। 1 सिख रेजीमेंट के इस बहादुर सूबेदार ने 23 अक्टूबर 1962 को अकेले ही चीनी सेना के तीन पूर्ण हमलों को विफल कर दिया।
जब उनकी बंकर नष्ट हो गई और हथियार खत्म हो गए, तब भी उन्होंने खाली हाथों से दुश्मनों से लोहा लिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने अपने सैनिकों को प्रेरित किया – “हर सिख योद्धा सौ दुश्मनों के बराबर है!”
उनकी इस अद्भुत वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी तवांग की वादियाँ उनकी गाथा गाती हैं – “वह सिख शेर जिसने अकेले ही चीनी सेना को चुनौती दी!”
- जन्म: 6 जुलाई 1921, महल खुर्द, मंजीतपुर, पंजाब
- सेवा: सिख रेजिमेंट
- ब्रेवरी स्टोरी: 1962 में तोवांग (अरुणाचल प्रदेश) की लड़ाई में उन्होंने अकेले 50 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया। घायल होने पर भी दुश्मनों को खदेड़ते रहे।
- सम्मान: मरणोपरांत परमवीर चक्र
- विशेष तथ्य:
– उनकी वीरता पर कई वृत्तचित्र बन चुके हैं।
– अंतिम समय तक अपनी पोस्ट पर डटे रहे, “रिट्रीट” शब्द को नहीं जानते थे
– उनकी वीरता ने तवांग सेक्टर में भारतीय सैनिकों का मनोबल बनाए रखा
– उनके नाम पर सिख रेजीमेंट में विशेष सम्मान दिया जाता है
१०. CRPF जवान – कच्छ की लड़ाई (9 अप्रैल 1965)

9 अप्रैल 1965 को कच्छ के रण में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष में CRPF के 2 जवानों ने अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए इतिहास रच दिया। हवलदार अब्दुल हमीद (CRPF) और कांस्टेबल गुरबचन सिंह ने सरदार पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना के 300 सैनिकों और 30 पैटन टैंकों के हमले का सामना किया।
इन वीरों ने अपनी सीमित संसाधनों के बावजूद दुश्मन को 48 घंटे तक रोके रखा। जब गोला-बारूद खत्म हो गया, तब भी इन्होंने हाथों-हाथ लड़ाई जारी रखी। इनकी इस बहादुरी ने भारतीय सेना को जवाबी कार्रवाई के लिए कीमती समय दिलाया।
इन वीर सिपाहियों को अशोक चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। आज भी गुजरात की सीमा पर यह कहावत प्रचलित है – “दो CRPF के जवानों ने पूरी पाकिस्तानी बटालियन को चुनौती दे दी!”
- घटना स्थल: सरदार पोस्ट, कच्छ क्षेत्र, गुजरात
- पृष्ठभूमि: पाकिस्तान रेंजरों और सेना के 3500 जवानों ने CRPF की सरदार पोस्ट पर हमला किया।
- ब्रेवरी स्टोरी: केवल 180 CRPF जवानों ने सीमित हथियारों के बावजूद दुश्मनों को पीछे हटाया। 34 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि भारत को सिर्फ 6 जवानों का नुकसान हुआ।
- सम्मान: इस युद्ध के सम्मान में हर वर्ष 9 अप्रैल को CRPF शौर्य दिवस मनाया जाता है।
- विशेष तथ्य:
– यह CRPF का पहला अशोक चक्र प्राप्त करने वाला मामला था
– इस लड़ाई ने 1965 के युद्ध की नींव रखी
– इस घटना से CRPF की भूमिका और बहादुरी को नई पहचान मिली।
– आज भी सरदार पोस्ट पर स्मारक बना हुआ है
वीरता की समानता और अनोखे दृष्टिकोण
- धर्म से ऊपर देशभक्ति: ब्रिगेडियर उस्मान और अब्दुल हमीद जैसे सैनिकों ने सच्ची राष्ट्रीयता की मिसाल पेश की।
- गुमनाम गाथाएं: CRPF के वीरों की कहानियाँ आमतौर पर मुख्यधारा से बाहर रहती हैं।
- अंतिम शब्दों की शक्ति: मनोज पांडे और विक्रम बत्रा के अंतिम संवाद आज भी जोश भर देते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. परमवीर चक्र किसे दिया जाता है?
A: युद्धभूमि में असाधारण वीरता और बलिदान के लिए दिया जाता है।
Q2. क्या CRPF के जवानों को भी युद्ध सम्मान मिलते हैं?
A: हां, उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक, वीरता पदक जैसे सम्मान मिलते हैं।
Q3. क्या इन सैनिकों की स्मृति में स्मारक हैं?
A: हां, दिल्ली, द्रास, पलमपुर, आदि स्थानों पर वीर स्मारक बने हैं।
Q4. युवाओं के लिए इनसे क्या सीख मिलती है?
A: कर्तव्यनिष्ठा, निडरता और देश के लिए समर्पण।
निष्कर्ष
इन 10 वीरों की कहानियाँ महज इतिहास नहीं, प्रेरणा की जीवित मशालें हैं। ये हमें सिखाती हैं कि सच्चा राष्ट्रप्रेम शब्दों से नहीं, कर्मों से सिद्ध होता है। इन वीरों के बलिदान को श्रद्धांजलि देना तभी सार्थक है जब हम अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहें।
