मुस्लिम समुदाय में तलाक कैसे होता है? – विस्तृत मार्गदर्शिका हिंदी में

मुस्लिम समुदाय में तलाक कैसे होता है? – विस्तृत मार्गदर्शिका हिंदी में

भूमिका – इस्लामी दृष्टिकोण और सामाजिक पृष्ठभूमि

इस्लामिक कानून में विवाह एक अनुबंध (निकाह) माना जाता है, जिसकी रक्षा की प्राथमिकता दी जाती है। परंतु जब संबंध असंभव हो जाता है, तब तलाक अंतिम विकल्प होता है। कुरान और हदीस में तलाक के तरीके और इसमें सुलह की प्रक्रिया का विशेष उल्लेख है, जिससे तलाक को सहजता से नहीं बल्कि अंतिम संसाधन के रूप में देखा जाता है।
समाज में तलाक को एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न भी माना जाता है। महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षण के लिए, इस्लामिक व्याख्याओं में मध्यस्थता, विशेष सुलह प्रयास और विभिन्न प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून — इस्लामी कानून द्वारा निर्देशित — तलाक की प्रक्रिया निर्धारित करता है।

तलाक के प्रकार – इस्लाम में कानूनी विधियाँ –

 पति द्वारा तलाक (Talaq‑e‑Ahsan, Hasan, Biddat)

  1. तलाक‑ए‑अहसन
    सबसे सिलसिलेवार और सम्मानजनक तरीका, जिसमें पति एक बार तलाक कहता है, फिर तीन महीने (इद्दत अवधि) इंतजार करता है; अगर उस दौरान संबंध पुनः शुरू होता है, तलाक रद्द हो जाता है
  2. तलाक‑ए‑हसन
    तीन बार एक‑एक बार महीने के अन्तराल पर तलाक कहा जाता है। पति पहली या दूसरी बार रद्द कर सकता है, लेकिन तीसरी बार के बाद तलाक स्थायी हो जाता है।
  3. तलाक‑ए‑बिद्दत (Instant Triple Talaq)
    तीन बार एक ही समय में कहे गए शब्दों द्वारा तुरंत लगने वाले तलाक को कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया और 2019 में ट्रिपल तलाक एक्ट द्वारा अपराध घोषित किया गया है

पत्नी द्वारा तलाक (Khula & Talaq‑e‑Tafweez)

  • खुल्ला (Khula): पत्नी तलाक की मांग महिला के हाथों करती है, जिसमें वह मुआवजे, जैसे महर वापस करने की सहमति देती है। यदि पति मना कर दे, तब न्यायालय से अनुमति दी जाती है, पत्नी को इद्दत पालन करना आवश्यक होता है
  • तलाक‑ए‑तफवीज़ (Talaq‑e‑Tafweez): पति तलाक की शक्ति पत्नी को सौंपता है, ताकि वह स्वयं तलाक ले सकती है। दोनों सुन्नी और शिया समुदायों में मान्यता प्राप्त है

आपसी सहमति (Mubarat)

मुबारा के तहत पति-पत्नी दोनों सहमति से विवाह समाप्त करते हैं। इसमें आमतौर पर कोई मुआवजा नहीं होता, लेकिन इद्दत अवधि का पालन अनिवार्य होता है। इसमें न्यायालय की भागीदारी आवश्यक नहीं होती।

न्यायिक तलाक (Faskh)

  • Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 के तहत महिलाएँ फस्ख प्रक्रिया के माध्यम से तलाक माँग सकती हैं यदि पति:
    • लंबे समय तक अनुपस्थित है
    • भरण-पोषण नहीं कर रहा
    • पागल, नपुंसक, कुष्ठ, यौन रोगग्रस्त है
    • मनमाने “इल्ज़ाम” लगाएंटा आरोप (li’an)
    • पहले से नाबालिग विवाह की अनिवार्यता या धर्म परिवर्तन जैसे आधार हों

प्रमुख कानूनी फैसले और अदालती प्रभाव 

Shayara Bano vs Union of India (2017): सुप्रीम कोर्ट ने Instant Triple Talaq को असंवैधानिक ठहराया। यह भारत में महिलाएँ को सुरक्षा देने की दिशा में एक बड़ा कदम था

  • Telangana High Court (June 2025): खुल्ला की प्रक्रिया में पति की सहमति अनिवार्य नहीं है। महिला स्वतंत्र रूप से तलाक की मांगी कर सकती है—यह निर्णय महिलाओं के विधिक अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है
  • अन्य निर्णयों में कोर्ट ने “शमिम आरा बनाम यूपी” जैसे मामलों में पति की तलीक घोषणा साबित न होने पर अमान्य फैसला दिया और महिलाओं के अधिकारों की पुष्टि की है

 प्रक्रिया – तलाक कैसे लिया जाता है 

जानिए प्रत्येक विधि की प्रक्रिया:

तलाक‑ए‑अहसन / हसन

  • पति स्पष्ट रूप से तलाक कहता है
  • इद्दत अवधि (3 चक्र) पूरी होनी चाहिए
  • मध्य अवधि में अगर पुनर्मिलन होता है, तलाक रद्द होता है

खुल्ला

  • पत्नी नोटिस भेजती है, पति सहमत होने पर इद्दत पालित होती है
  • यदि पति सहमत न हो, पत्नी कोर्ट में याचिका डाल सकती है
  • अदालत मुआवजा तय कर सकती है, निर्णय देकर तलाक दे सकती है

मुबारत

  • पति-पत्नी दोनों समझौते पर सहमत होते हैं
  • कोई मुआवजा अनिवार्य नहीं, इद्दत अवधि के बाद तलाक स्थायी हो जाता है

फस्ख

  • पत्नी कोर्ट में याचिका दायर करती है
  • कोर्ट जांच कर पति द्वारा दोष या उपेक्षा पाए जाने पर तलाक दे सकता है
  • अदालत अदालत ही निर्णय देती है और इद्दत पालन निर्देशित होती है

 तलाक के बाद अधिकार: इद्दत, मेहर और बच्चे 

इद्दत (Iddat)

  • तलाक के बाद महिला को तीन मासिक चक्र (या गर्भावस्था तक) तक इद्दत अवधि का पालन करना होता है। इस दौरान पुनर्विवाह निषिद्ध होता है

मेहर (Mahr)

  • यदि तलाक पति ने दिया—महर पत्नी को मिलता है
  • खुल्ला द्वारा तलाक में, पत्नी को मेहर वापस करना पड़ सकता है 
  • फस्ख में यह बहस/न्यायालय आदेश पर निर्भर होता है

बच्चों की कस्टडी

  • मुस्लिम विधि में आमतौर पर बच्चों की हिरासत माता को दी जाती है जब तक वे निर्दिष्ट आयु तक न पहुँच जाएँ; पिता की देखभाल और भरण‑पोषण दायित्व नियमों से तय होता है।

सामाजिक व महिला दृष्टिकोण 

  • पारंपरिक डायवोर्स तरीके—इन्सिरियाई प्रक्रिया—महिलाओं के प्रति असमान थे। अब खुला, मुबारा, और फस्ख जैसी प्रक्रियाएँ महिलाओं को अधिकार देती हैं
  • शापित तलाक‑ए‑बिद्दत को रद्द करने के निर्णय से महिलाएँ अधिक सशक्त हुईं।
  • फिर भी सामाजिक पूर्वाग्रह—गाँवों या समुदायों में—तलाक के बाद महिलाओं का सामना चुनौतियों से करना पड़ता है।

प्रमुख सवाल–जवाब – FAQs:

प्रश्न 1: तीन‑तलाक (Talaq‑e‑Biddat) क्या है?
उत्तर: Instant तलाक जो तीन बार एक साथ कहा जाता है; भारत में असंवैधानिक घोषित।
प्रश्न 2: खुल्ला और मुबारत में अंतर क्या है?
उत्तर: खुल्ला: पत्नी द्वारा तलाक मांगना; मुबारत: आपसी सहमति से तलाक।
प्रश्न 3: क्या महिलाओं को तलाक का अधिकार है?
उत्तर: हां, खुल्ला और फस्ख कानून के तहत महिलाएँ तलाक माँग सकती हैं।
प्रश्न 4: इद्दत अवधि क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: गर्भावस्था की पुष्टि और संभावित पुनर्मिलन के लिए नियत समय।
प्रश्न 5: फस्ख दिलाने के लिए क्या चाहिए?
उत्तर: पति की अनपेक्षा, अपमान, मानसिक बीमारी, अनुपस्थित वर्ष आदि आधार कोर्ट में साबित।
प्रश्न 6: क्या पति की सहमति हमेशा आवश्यक है?
उत्तर: स्वतंत्र खुल्ला में नहीं; लेकिन फस्ख में अदालत की अनुमति जरूरी होती है।
प्रश्न 7: मेहर किसे मिलता है?
उत्तर: तलाक‑ए‑अहसन/हसन में पत्नी को मेहर मिलता है; खुल्ला में मेहर लौटानी पड़ सकती है।
प्रश्न 8: मुबारा की प्रक्रिया कोर्ट में होती है?
उत्तर: आमतौर पर नहीं, लेकिन समझौता पक्का होना चाहिए।
प्रश्न 9: क्या तलाक-ए-अहसन कानूनी रूप से स्वीकार्य है?
उत्तर: हाँ, बशर्ते उचित प्रक्रिया पालन हो और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता दी जाती है
प्रश्न 10: पुनर्विवाह कब संभव है?
उत्तर: इद्दत अवधि समाप्त होने पर स्वतंत्र रूप से संभव है।

 निष्कर्ष:

इस लेख में हमने मुस्लिम قانون में तलाक की प्रक्रियाओं — पति द्वारा (तलाक‑ए‑अहसन, हसन, बिद्दत), पत्नी द्वारा (खुल्ला, तफ़वीज़), आपसी (मुबारा), तथा न्यायालय (फस्ख) — की सम्पूर्ण व्याख्या की है।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने Instant Triple Talaq को असंवैधानिक ठहराया और महिला अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम उठाया।
खुल्ला की प्रक्रिया में पत्नी को पति से सहमति न मिलने पर भी अदालत से सुविधा प्राप्त है, जैसा Telangana HC ने भी स्पष्ट किया है।
समाज की जागरूकता, न्यायिक प्रक्रिया, महिला सुरक्षा और धार्मिक समझ—इन सब से तलाक सिर्फ एक विधिक क्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक एवं सामाजिक अधिकार बन जाता है।

Bharative

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *