भारत के वो 10 शासक, जिनकी कहानियाँ आज भी प्रेरणा हैं
प्रस्तुत लेख में हम उन 10 महान भारतीय शासकों की वीरकथा सुनेंगे, जिन्होंने न सिर्फ युद्ध जिते बल्कि धर्मनिरपेक्षता, न्याय और संस्कृति के क्षेत्र में अमिट योगदान दिया—आज भी ये हमें नेतृत्व, नैतिकता और शौर्य का पाठ पढ़ाते हैं।
१. सम्राट अशोक – अहिंसा का आदर्श शासक (273–232 ई.पू.)

सम्राट अशोक मौर्य वंश के महान सम्राट थे, जिनका जन्म लगभग 232 ई.पू. पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में हुआ था। वे चैंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिन्दुसार के पुत्र थे। कुपोषण और विवादित उत्तराधिकार युद्धों के बाद उन्होंने 268 ई.पू. में सिंहासन संभाला। वे मौर्य साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली सम्राटों में से एक थे। उनकी पत्नी देवी (उज्जयिनी की वंशज) और कौर्वकी थीं, उनके पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका तक फैलाया। अशोक की मृत्यु 273 ई.पू. में हुई, जिसके बाद मौर्य गणराज्य धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हुआ।
कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) में उन्होंने ओडिशा (कलिंग) पर आक्रमण किया, जिसमें लगभग एक लाख लोग मारे गए और हजारों बेघर हुए—जिससे वे गहरे दुखी हुए और बौद्ध धर्म अपनाया। उन्होंने बौद्ध धर्म अंगीकार किया और पूरे साम्राज्य में अहिंसा तथा धर्मनिरपेक्षता का प्रचार किया।
युद्ध के पश्चात उन्होंने धर्मशाला, अस्पताल, कृषि, शिक्षा और आवास में सुधारों का कार्य शुरू किया। अशोक की प्रशासनिक व्यवस्था में ड्रामा ना सिर्फ शासन का आधार थी बल्कि संस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच सहिष्णुता का संवाहक भी बनी। उन्होंने अशोक स्तंभ और चट्टान शिलालेख बनवाए, जिनमें राजपालन और सामाजिक न्याय का संदेश मिलता है। उन्होंने अशोक स्तंभ, शिलालेख और धार्मिक संवाद के माध्यम से सामाजिक न्याय, अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता का संदेश फैलाया। वर्तमान में अशोक स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और यह शांति का संदेश विश्वपतित करता है, जो उनके आदर्श की अमरता का प्रमाण है।
- जन्म: 232 ई.पू. पाटलिपुत्र; बिन्दुसार के पुत्र
- कलिंग युद्ध: 261 ई.पू. – अधिकांश जिला प्रभावित
- धर्म परिवर्तन: अहिंसा-अधारित शासन
- प्रमुख नीतियाँ: शिक्षण, चिकित्सा, मार्गबात, कृषि सुधार
- पत्नियाँ: देवी व कौर्वकी; संतान: महेन्द्र, संघमित्रा
- मृत्यु: 273 ई.पू. – बौद्ध, धर्मशालाओं के आधार पर प्रसिद्ध
२. छत्रपति शिवाजी महाराज – हिंदवी स्वराज के संस्थापक (1630–1680)

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी किले में हुआ। उनके पिता शाहाजी भोंसले बिज़ापुर सल्तनत के सेनापति थे और माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण व महाभारत की कथाएँ सुनाकर स्वराज और धर्म का पाठ पढ़ाया। उनकी पाँच प्रमुख पत्नियाँ थीं — साईबाई, सोयराबाई, पुतलाबाई, साकवरबाई और काशिबाई, उनके पुत्रों में संभाजी और राजाराम प्रमुख थे।
शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की नींव रखी और गुरिल्ला युद्धशैली के माध्यम से दुश्मन पर कब्जा जमाया। उन्होंने 14 मंत्रियों की परिमार्जित प्रशासनिक प्रणाली शुरू की जो आज भी लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है। उन्होंने नियमों पर आधारित अधिकार संरचना और सैन्य संगठन बनाकर स्वराज की रक्षा सुनिश्चित की। श्रीमंत आदर्शों पर आधारित न्याय व्यवस्था ने सभी वर्गों को संरक्षण दिया। शिवाजी की नौसेना ने समुद्री सीमाओं की रक्षा की और उनके किले (राजगड, रायगढ़) आज भी उनकी रणनीतिक दूरदर्शिता का प्रतीक हैं।
1645 में शिवाजी ने तोरणे का किला जीता, और परंपरागत गुरिल्ला युद्धनीति (गनीमी काड़ा) अपनाकर बड़े किलों को कब्जे में लिया। 1659 में प्रातापगढ़ की लड़ाई में आदिलशाही सेनापति अफज़ल खान को अपने बाघ-नाखा से मार गिराया। इसके बाद मराठा सेना ने जंगलों और किलों में अभियान चलाकर हार्दिक विजय हासिल की। 1664 में उन्होंने समुंदरगढ़ (सिंधुदुर्ग) से शुरू होकर एक नौसेना का गठन किया और पोर्ट्स जैसे सूरत पर आक्रमण कर धन अर्जित किया। उन्होंने 1674 में रायगढ़ में छत्रपति की उपाधि ग्रहण कर ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की। 3 अप्रैल 1680 को हनुमान जयंती के दिन उनकी मृत्यु हुई, ऐसी मान्यता है कि पुतलाबाई ने ‘सती’ होकर स्वयं को अग्नि में लगाया।
- जन्म: 19 फ़रवरी 1630, शिवनेरी किला
- प्रमुख युद्ध और रणनीति:
- 1659: प्रातापगढ़ (अफज़ल खान)
- 1660: पवानखिंड (बाजी प्रभु की शहादत)
- 1664: सू्रत हमला
- किले: तोरणा, रायगढ़, सिंधुदुर्ग
- नौसेना: पोर्ट सुरक्षा, अज्र
- पत्नियाँ: साईबाई, सोयराबाई, पुतलाबाई, साकवरबाई, काशिबाई
- संतान: संभाजी, राजाराम + बेटियाँ
- मृत्यु: 3 अप्रैल 1680, रायगढ़ – पुतलाबाई की सती
३. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य – साम्राज्य का केंद्रीय आधार (लगभग 340–297 ई.पू.)

चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य वंश के संस्थापक और प्रथम सम्राट थे। उनका जन्म लगभग 340 ई.पू. पाटलिपुत्र (आज का पटना) में हुआ था और वे बिन्दुसार के पिता तथा अशोक के दादा थे । वे चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में युवावस्था में ही ताकतवर बन गए, और लगभग 321–323 ई.पू. में नंद वंश को परास्त कर मगध पर अधिकार कर लिया ।
उन्होंने पंजाब से लेकर बंगाल व असम तक तथा अफगानिस्तान तक तक़रीबन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में शासन का विस्तार किया। 305 ई.पू. में सिकंदर के सेनानियों—सेलेकस निकेटर—के खिलाफ विजयी होकर एक सहमति समझौता किया और राजनैतिक गठबंधन शैली अपनाई । उनकी पत्नी दुर्धरा (जो संभवतः उनके मामा की पुत्री थी) और दूसरी पत्नी थी ग्रीक राजकुमारी हेलेना (सेलेकस की बेटी)।
दुर्धरा की पूर्ववती मृत्यु के समय जन्मे पुत्र बिंदुसार ने बाद में अशोक को जन्म दिया । चंद्रगुप्त बाद में जैन साधु बन गए और कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में सन् 297 ई.पू. में साधना के दौरान ‘सलेखना’ द्वारा स्वेच्छा से देह त्याग दी ।
चाणक्य (कौटिल्य) की प्रेरणा में चंद्रगुप्त मौर्य (340–298 ई.पू.) ने मगध पर कब्ज़ा जमाया और पाटलिपुत्र से शुरू होकर सम्पूर्ण भारत को एकजुट किया। उन्होंने कठोर कर प्रणाली, मजबूत न्यायपालिका और जरूरतमंदों के कल्याण नीति पर जोर दिया। उनकी आर्थिक रणनीतियों में खेतों का वित्त पोषण, व्यापार में सुविधाएँ और ग्रामीण विकास शामिल थे। कुशल सैन्य ताकत, चाणक्य की नीति, तथा सतत विस्तार के कारण मौर्य साम्राज्य ने तत्कालीन विश्व में अद्वितीय स्थिरता पाई। चंद्रगुप्त और चाणक्य की सहयोगी योजना आज भी राज्य निर्माण और नीति निर्धारण के अध्ययन में सृजनात्मक मॉडल के रूप में प्रयोग की जाती है।
- जन्म: ~340 ई.पू., पाटलिपुत्र
- उत्तरोत्तर युद्ध: नंद वंश पर विजय; पंजाब और अफगान-क्षेत्र पर विस्तार
- पति-परिवार: प्रथम पत्नी दुर्धरा; दूसरी पत्नी हेलेना या हेल्थिना (ग्रीक राजकुमारी)
- संतान: पुत्र बिंदुसार; पौत्र अशोक महान
- संयुक्त युद्ध परिणाम: साम्राज्यिक विस्तार, आर्थिक-प्रशासनिक कठोरता
- मृत्यु: 297 ई.पू., श्रवणबेलगोला में जैन साधना से
- उत्तराधिकार: शासन बिंदुसार को सौंपा; गुरु–राजा चाणक्य
४. महाराणा प्रताप – संघर्ष की मूर्ति (1540–1597 ई.)

महाराणा प्रताप सिंह, मेवाड़ (उदयपुर, राजस्थान) के 13वें राजा, का जन्म 9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ किले में हुआ था। उनके पिता थे महाराणा उदय सिंह II और माता महारानी जयवंता बाई ।
1572 में उदय सिंह की मृत्यु के बाद प्रताप ने सिंहासन संभाला। उन्होंने मुग़ल सम्राट अकबर को चित्तौड़गढ़ पर हमला करने का अवसर दिया लेकिन मनेर में युद्ध कर अकबर के ग्यारहों दशकों के सफाए को टाला।
हल्दीघाटी (1576) की लड़ाई में उन्होंने अफशाल ख़ान की सेना का मुकाबला किया—जहाँ उनका सेनापति बनौरा बाजी प्रभु वाघ मार गया । बाद में 1582 में द्वेयर की लड़ाई में प्रताप ने जहंगीर की सेना को पराजित किया और मेवाड़ के अधिकांश हिस्से वापस पा लिए ।
उनकी पांच प्रमुख पत्नियों में शामिल थीं: महारानी जयवंता बाई, अजबदे पुणवार, सोलंकी देवी (धीरबाई), फूलबाई राठौड़ आदि ।
उनके बच्चे: अटल सिंह II से अमर सिंह I (उत्तराधिकारी) तक कई थे।
प्रताप का मरण 19 जनवरी 1597 को हुआ; आखिरी समय में उन्होंने अपने पुत्र अमर सिंह को कभी मुग़लों के सामने झुको मत कहा।
महाराणा प्रताप (1540–1597) ने हल्दीघाटी युद्ध में राणा सांगा के वंश का सम्मान कायम रखा और मुगल अधीनता को चुनौती दी। उन्होंने प्रबल संकल्प और संकल्प शक्ति से चित्तौड़ संभाला और कभी न झुकने का संदेश दिया। प्राकृतिक जंगलनीतियाँ अपनाकर मुगल सेना को खदेड़ा और वहीं घना और लम्बी लड़ाई में पूरी दृढ़ता दिखाई। प्रताप के पास सीमित संसाधन थे, लेकिन उन्होंने जल-बेमौसम जल-पूर्ति और स्थानीय सहयोग से सेना का समर्थन बढ़ाया। उनका संदेश “विवेक और संघर्ष का मेल” आज भी भारतीय युवाओं के लिए उदाहरण है।
- जन्म: 9 मई 1540, कुम्भलगढ़ (मावर)
- युद्ध: हल्दीघाटी (1576), द्वेयर (1582)
- पत्नी: जयवंता बाई, अजबदे पुणवार, धीरबाई, फूलबाई जैसे
- संतान: अमर सिंह I, शक्ति सिंह आदि
- सेनापति व सहयोगी: बाजी प्रभु वाघ (हल्दीघाटी)
- मृत्यु: 19 जनवरी 1597, उम्र ~56 वर्ष; राजसत्ता मेवाड़ अमर सिंह को लौटी
- उत्तराधिकारी: अमर सिंह I, बाद में करन सिंह II
५. सम्राट अकबर – मुगल सम्राज्य का धर्मनिरपेक्ष शासक (1542–1605)

सलीम नामित जन्म से मशहूर अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमर सिंह कीन्हा (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ। वे मुगल सम्राट हुमायूँ और महमूद हुमायूं की पत्नी महमूद बानो बेगम के पुत्र थे।
अकबर ने 1556 में राजधानी आगरा से अपनी आधिकारिक सत्ता सँभाली। 1562–93 तक मुगल साम्राज्य को मध्य और उत्तरी भारत पर फैलाया: वह राणा उदय सिंह, इब्राहिम लोदी व राजपूत राजाओं के खिलाफ कई युद्धों में विजयी रहे। खासकर 1562 में राणा प्रताप से प्रतापगढ़ की लड़ाई महत्वपूर्ण थी। अकबर ने जजिया कर हटाया, राजपूतों के साथ विवाह-राजनीति अपनाई और ‘दीन-ए-इलाही’ नामक धर्मनिरपेक्ष दर्शन प्रस्तुत किया।
उनकी मुख्य पत्नियाँ थीं: रूपक बेगम, मरियम-उज-जमानी सलमा सुलतान बेगम (जो हज यात्रा पर गईं) . अकबर के बेटे थे: जयमल, डारा शिकोह, और जहांगीर (उनकी कोंटूर कमर बेटे)। उनमें से जहांगीर ने बाद में सिंहासन संभाला।
उनके सेनापति-राजनेता मानी जाने वाली ‘नऊरतन’ (नौ रत्न) में राजा मान सिंह और बीरबल प्रमुख थे। अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को आगरा में स्वाभाविक रूप से हुई।
अकबर (1542–1605) ने भारत को धर्मनिरपेक्ष, समतावादी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया। उन्होंने जजिया कर हटाया, राजपुथों के साथ विवाह-राजनीति की और ‘दीन-ए-इलाही’ नामक धार्मिक समन्वय यज्ञ स्थापित किया। उनकी शासन प्रणाली में कर सुधार, न्यायिक प्रबंधन, कला और स्थापत्य में विशेष योगदान मिला—जैसे फतेहपुर सीकरी। अकबर ने भारतीय शासन-व्यवस्था को आधुनिक दृष्टिकोण से संवादात्मक रूप दिया, जिससे राजनैतिक स्थिरता व सामाजिक समावेश को बढ़ावा मिला।
- जन्म: 15 अक्टूबर 1542, अमर सिंह कीन्हा
- विजय‑युद्ध: प्रतापगढ़ (1562), राणा प्रताप, अन्य राज्यों वाला
- प्रशासन: जजिया हटाना, धर्मनिरपेक्षता, दीन-ए-इलाही
- पत्नियां: सलिमा सुलतान बेगम, रूपक, मरियम
- संतान: जहांगीर (उत्तराधिकारी)
- सेनापित: राजा मान सिंह, बीरबल, राजा मन सिंह
- मृत्यु: 27 अक्टूबर 1605, आगरा
६. पृथ्वीराज चौहान – तराइन का वीर (1178–1192 ई.)

पृथ्वीराज चौहान, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से 1178 में जींद (हरियाणा) में जन्मे, चौहान वंशीय राजपूत थे। वे रWeakReshis ki Rajulu—की राजपरिवार से संबद्ध थे। उन्होंने मुहम्मद गौरी के खिलाफ दो बार युद्ध लड़ी—1191 की पहली तराइन में विजय हुई लेकिन 1192 में गौरी ने उन्हें पुनः परास्त किया। उनकी वीरता और रणनीति पूरे उत्तर भारत में प्रख्यात हुई, जिससे वे राजपूत संस्कृति के महाकवि रूपक बन गए। उनकी प्रमुख पत्नियाँ सानु, समदान और कुंद वाटी थीं। उनके पुत्र बाजी प्रताप (संभवत: मरदाना चौहान) थे, जो बाद में भीषण युद्ध में शहीद हुए। उनकी मृत्यु 1192 की दूसरी लड़ाई में हुई, और तब से वे भारतीय वीरगाथाओं में अमर हो गए।
पृथ्वीराज की वीरगाथाएं मुकुट धारी इतिहास का हिस्सा बनीं—उनकी सेना हारने के बावजूद, उनकी प्रतिष्ठा आज भी उच्च है।
पृथ्वीराज चौहान (1178–1192) पहली तराइन युद्ध में मुहम्मद गौरी को हराकर उत्तर भारत के लोक में अजर-अमर हुए। यह जलयान रणनीति सिखाता है कि छोटे राजा भी बड़े आक्रमणकारियों का सामना कर सकते हैं यदि देशभक्ति और नीति साथ हो। उनकी वीरता और पदचिह्न उस दौर में “भारत-वीरता” की मिसाल बने। लोककथाओं, राजगीर्वाल्या और कवियों ने उनको महाकवि प्रतिष्ठा दी। बाद में उन्हें पुनः याद किया गया जब भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम कथाओं में उनका नाम प्रेरणास्त्रोत बना।
- जन्म: 1178, जींद (हरियाणा)
- युद्ध: पहली तराइन (1191 विजयी), दूसरी तराइन (1192 पराजित)
- पत्नियाँ: सानु, समदान, कुंद वाटी
- संतान: बाजी प्रताप (मरदाना चौहान)
- मृत्यु: 1192, दूसरी तराइन में
- ख्याति: वीर राजपूत संस्कृति का प्रतीक
७. राजा राजा चोल प्रथम – समुद्री साम्राज्य के नेता (985–1014)

राजा राजा चोल का जन्म 947 ईस्वी में तमिलनाडु में हुआ था। उन्होंने 985 में सिंहासन संभाला और 1014 तक राज्य किया। उन्होंने दक्षिण भारत, श्रीलंका, लक्षद्वीप और मालदीव सहित कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।
उनके प्रमुख सेनापति और सहयोगी थे: उनकी बहन कुंदवाई (प्रशासन में मददगार) ।
उनकी पत्नियाँ थीं: वाह्नथी, लोकमहादेवी, चोलमहादेवी समेत सात रानियाँ । उनके प्रमुख संतान में राजेंद्र चोल जूनियर (उत्तराधिकारी) और पुत्रियाँ कुंदवाई व_mathevalzagal_ थीं।
राजा राजा ने महान बृहदीश्वर मंदिर तंजोर में बनवाया, भूमि सर्वेक्षण करवाया और नौसेना तैयार की ।
उनकी मृत्यु 1014 ईस्वी में तमिल माह में प्राकृतिक कारणों से हुई—कुछ किंवदंतियों में श्रीलंका की महिला द्वारा हत्या की अफवाह भी है।
राजा राजा चोल (985–1014) ने तमिलनाडु से शुरू होकर श्रीलंका तक समुद्री वाणिज्यिक मार्ग खोले और शांत महासागर में राज किया। उन्होंने मजबूत नौसैनिक शक्ति, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण, और व्यापार को संभावित बनाकर दक्षिण भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा। तंजोर शिवमंदिर ने उनका भव्य स्थापत्य चिन्हित किया, जो कला में धार्मिकता और शक्ति का मेल दर्शाता है। उनकी नीतियाँ राज्य को आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्धन देती हैं।
- जन्म: 947, तमिलनाडु
- विजय‑युद्ध: श्रीलंका, चेर, पांड्या, लक्षद्वीप, मालदीव
- पत्नियाँ: वाह्नथी, लोकमहादेवी, आदि (कुल 7)
- संतान: राजेंद्र I, कुंदवाई, Mathevalzagal
- सेनापति: बहन कुंदवाई
- प्रमुख कार्य: तंजोर मंदिर, नौसेना, भूमि सर्वेक्षण
- मृत्यु: 1014, प्राकृतिक / गुप्त
८. कृष्णदेवराय – विजयनगर साम्राज्य का शेर (1471–1529)

कृष्णदेवराय का जन्म 17 जनवरी 1471 को हम्पी (कर्नाटक) में हुआ, वे तुलुवा वंश से थे। उन्होंने 1509 से 1529 तक विजयनगर की सर्वोच्च सत्ता संभाली।
उनके सेनापति तथा गुरु वीयर तमरुसु थे, जिन्हें उन्होंने अपना पिता समान माना। उन्होंने बिधान्डल, बीजापुर, बहमनी, उड़ीसा के गजपति, कोंडावी और रायचुर तक विजय प्राप्त की।
उनकी पत्नियाँ थीं: तिरुमाला देवी, चिंनामा देवी, अनापूर्णा देवी (गजपति की पुत्री, शांति-धार्मिक विवाह) ।
उनके संतान में तिरुमला राय (युवराज) प्रमुख थे, परंतु 1524 में उनकी मृत्यु (संभवतः जहर) हो गई; इसके दो साल बाद कृष्णदेवराय ने भाई आच्यूता देवराय को उत्तराधिकारी घोषित किया ।
वे स्वयं कवि और शिव भक्त थे—उन्होंने “अमुक्तमाल्यदा” लिखी और अद्भुत स्थापत्य (वित्तल व रामस्वामी मंदिर) बनवाए ।
उनकी मृत्यु अक्टूबर 1529 में हम्पी में बीमारी से हुई, जिससे विजयनगर का यश कम होने लगा।
कृष्णदेवराय (1509–1529) विजयनगर साम्राज्य के सबसे महान सम्राट रहे, सम्प्रति कवि भी थे और अष्टदिग्गजों को संरक्षित किया। उन्होंने राज्य को प्रशासनिक, सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ किया। मंदिर निर्माण के साथ-साथ राज्य संरचना को व्यापक बनाया और गुजरात व बीजापुर के साथ युद्धों में विजयी रहे। उनका शासन भारतीय शासकीय गौरव का प्रतीक बन गया और आज भी उनकी राजधानी हल्लबीडु और हम्पी के खंडहर गाथाओं का केंद्र बने हुए हैं।
- जन्म: 17 जनवरी 1471, हम्पी
- युद्ध: बीजापुर, बहमनी, गजपति, रायचुर उप विजय
- पत्नियाँ: तिरुमाला देवी, चिंनामा देवी, अनापूर्णा देवी
- संतान: तिरुमला राय (Yuvraj)
- गुरु–सेनापति: तिमारुसु
- साहित्य/ स्थापत्य: “अमुक्तमाल्यदा”, वित्तल मंदिर
- मृत्यु: 17 अक्टूबर 1529, बीमारी
९. महाराजा रणजीत सिंह – पंजाब के शेर (1780–1839)

महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर 1780 को राघूनाथपुर, पंजाब में हुआ। वे सुकरचाकिया मिसल के प्रमुखके घराने से थे ।
उन्होंने 1799 में लाहौर पर कब्ज़ा कर पंजाब को एकीकृत किया; 1818 में मुलतान, 1819 में पेशावर और कश्मीर (1814) को जोड़ा । उनकी सेना धर्मनिरपेक्ष थी—सिख, मुस्लिम, हिंदू और यूरोपीय अफसर शामिल थे ।
उनकी प्रमुख पत्नियाँ थीं: मेहताब कौर (खाँगा राजपूत, जिनसे शेर सिंह और तरा सिंह हुए), मोरन साकार, राज बानो आदि ।
उनके बच्चों में शेर सिंह (1841–43 का शासक), रतन सिंह, तरा सिंह आदि थे ।
उनके प्रमुख सेनापति थे: देवान मोकाम चंद (अटॉक व पेशावर विजय), जन फ्राँसिस ऑलार्ड (यूरोपीय अफसर) ।
रणजीत सिंह की मृत्यु 27 जून 1839 को लाहौर में पक्षाघात के कारण हुई; दो 28 को राजमाता की रानियाँ समेत सात स्त्रियाँ सती हुईं।
रणजीत सिंह (1780–1839) ने पंजाब को एकीकृत किया और किसी धर्म विशेष का पक्ष नहीं लिया। उन्होंने हिंदू, सिख व मुस्लिम नेताओं को साथ लेकर धर्मनिरपेक्ष शासन का आरंभ किया। उन्होंने आधुनिक सेना संरचना, प्रेरक नेतृत्व पद्धति और नागरिक कल्याण नीति अपनाई। रणजीत सिंह के समय में पंजाब गृह युद्ध, अफगान आक्रमण व ब्रिटिश विस्तार का मुकाबला कर पाया। यह समय पंजाब में राजनीतिक व सामाजिक स्थिरता का प्रतीक था।
- जन्म: 13 नवम्बर 1780, राघूनाथपुर
- विजय: मुलतान, पेशावर, कश्मीर, कंगड़ा
- पत्नियाँ: मेहताब कौर (शेर सिंह, तरा सिंह), मोरन साकार
- संतान: शेर सिंह, रतन सिंह, तरा सिंह
- सेनापति: मोकाम चंद, जन ऑलार्ड
- मृत्यु: 27 जून 1839, पक्षाघात; रानियों की सती
१०. समुंद्रगुप्त – भारत का नेपोलियन (335–380 ई.)

समुंद्रगुप्त गुप्त वंश के महान सम्राट थे, जो लगभग 335 में मगध में जन्मे। वे चंद्रगुप्त I और कुमारदत्त कुल की संगिनी शिवमाति की संतान थे। उन्होंने उत्तर भारत में एक श्रृंखला युद्ध लड़ी—जैसे काश्मीरी राजाओं, पाण्ड्यों और चेरों के विरुद्ध—जिससे गुप्त साम्राज्य “स्वर्ण युग” कहलाया। सम्मिलित शिलालेख में उनके द्वारा 18 साम्राज्य पर विजय का वर्णन मिलता है। समुंद्रगुप्त की पत्नियों में विभाजिका, सोमदत्त का नाम प्रमुख है और उनके श्रेष्ठ पुत्र बुद्धा गुप्त थे। वे कला, शिक्षा—नालंदा विश्वविद्यालय—और धार्मिक सहिष्णुता के समर्थक थे। उनकी मृत्यु लगभग 380 ई. में प्राकृतिक कारणों से हुई। समुंद्रगुप्त का शासन भारत में आर्थिक, सांस्कृतिक और साम्राज्यिक विस्तार का अद्वितीय उदाहरण रहा।
समुंद्रगुप्त (335–380) ने उत्तर भारत में लगातार विजय प्राप्त कर ‘गुप्त युग’ की नींव रखी। उन्होंने शिलालेखों में खुद को ‘नैपोलियन’ कहा और अपार साहित्यिक, शासकीय व सांस्कृतिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। उनका कलाकृति व वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारत को एक सुवर्ण युग दे गया। उनकी आवृत्ति प्रश्नों का जवाब देते हुए सामर्थ्य और नीति की मिसाल बनी।
- जन्म: 335 ई. में मगध
- विजय युद्ध: उत्तर-भारत और दक्षिण-समुद्र एकीकरण
- पत्नियाँ: विभाजिका, सोमदत्त
- संतान: बुद्धा गुप्त
- कला-अभ्यारण्य: नालंदा विश्वविद्यालय प्रोत्साहन
- शासनकाल: आर्थिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि
- मृत्यु: ~380 ई., प्राकृतिक कारण
निष्कर्ष
भारत के ये 10 शासक न सिर्फ युद्ध में विजयी हुए, बल्कि उन्होंने नीति, न्याय और धर्मनिरपेक्षता की नींव रखी—जो आज भी हमारे शासन, नेतृत्व और व्यक्तिगत जीवन में दिशा-निर्देश का आधार हैं। इनके आदर्शों से हम गम्भीर, प्रेरणादायक और नैतिक नेतृत्व सीख सकते हैं।
इन 10 शासकों की कहानियां वीरता, नैतिकता, धर्मनिरपेक्षता व न्याय की मिसाल हैं। इतिहास से हमें यही सीखनी चाहिए कि नेतृत्व केवल सत्ता नहीं बल्कि विचार, संस्कृति और समाज में बदलाव लाने की जिम्मेदारी है।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: इनमें सबसे धर्मनिरपेक्ष शासक कौन हैं?
A1: अशोक और अकबर, दोनों ने धर्मनिरपेक्षता को शासन नीतियों में स्थायी किया।
Q2: गुरिल्ला युद्धनीति का सबसे बड़ा उदाहरण किसका है?
A2: शिवाजी महाराज ने जंगल व किले की रणभूमि में गुरिल्ला युद्धनीति का सफल प्रयोग किया।
Q3: कला-संस्कृति के संरक्षक शासक कौन थे?
A3: कृष्णदेवराय और राजा राजा चोल ने अपने राज्य को स्थापत्य और संस्कृति में सजाया।
Q4: आज के नेता किस शासक से सीख सकते हैं?
A4: अकबर के धर्मनिरपेक्ष प्रशासन, अशोक की शांति नीति, व रणजीत सिंह के धर्म-समावेशी नेतृत्व से प्रेरणा मिलती है।
